देश में कामकाज से जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या आठ साल में दोगुनी होकर 20 करोड़ के पार पहुंच गई है। लेकिन उनकी जिंदगी आसान होने के बजाय और व्यस्त हो गई है।
बाहर नौकरी और आजीविका की जिम्मेदारी तो बढ़ी, मगर घर और बच्चों की देखभाल में पुरुषों का हाथ बंटाने का दायरा नहीं बढ़ सका। नतीजा यह है कि महिलाओं पर दोहरा बोझ आ गया है।
घर और बाहर के काम निपटाने के फेर में अब उन्हें आराम, नींद और खुद के लिए पुरुषों के मुकाबले हर दिन 70 मिनट कम समय मिल पा रहा है।



